राष्ट्रीय परशुराम परिषद

राष्ट्रीय परशुराम परिषद | वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः | धर्म, संस्कृति और न्याय के लिए समर्पित | राष्ट्रीय परशुराम परिषद | वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः | धर्म, संस्कृति और न्याय के लिए समर्पित | राष्ट्रीय परशुराम परिषद | वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः | धर्म, संस्कृति और न्याय के लिए समर्पित | राष्ट्रीय परशुराम परिषद | वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः | धर्म, संस्कृति और न्याय के लिए समर्पित | राष्ट्रीय परशुराम परिषद | वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः | धर्म, संस्कृति और न्याय के लिए समर्पित | राष्ट्रीय परशुराम परिषद | वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः | धर्म, संस्कृति और न्याय के लिए समर्पित | राष्ट्रीय परशुराम परिषद | वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः | धर्म, संस्कृति और न्याय के लिए समर्पित | राष्ट्रीय परशुराम परिषद | वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः | धर्म, संस्कृति और न्याय के लिए समर्पित | राष्ट्रीय परशुराम परिषद | वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः | धर्म, संस्कृति और न्याय के लिए समर्पित | राष्ट्रीय परशुराम परिषद | वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः | धर्म, संस्कृति और न्याय के लिए समर्पित |

राष्ट्रीय परशुराम परिषद 

धर्मरक्षा से राष्ट्र निर्माण तक

भगवान श्रीपरशुराम जी — धर्म, तप और न्याय के चिरंतन प्रतीक

भगवान श्रीपरशुराम, ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि भृगु के वंशज, भगवान श्रीविष्णु के छठे अवतार एवं महर्षि जमदग्नि तथा साध्वी रेणुका के तेजस्वी पुत्र हैं। वे चिरंजीवी हैं—काल, युग और परिस्थितियों से परे धर्म की चेतना के साक्षात् स्वरूप। पितामह महर्षि ऋचीक के सान्निध्य में वेद, उपनिषद और शास्त्रों का गहन अध्ययन कर उन्होंने ब्रह्मविद्या को आत्मसात किया तथा कैलास पर्वत पर कठोर तपस्या द्वारा भगवान महादेव से दिव्य शस्त्र-विद्या और परशु को प्राप्त किया। त्रेता युग में भगवान श्रीराम को शार्ङ्ग धनुष तथा द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र प्रदान कर उन्होंने युगों-युगों तक धर्म की निरंतरता को सुनिश्चित किया।

भगवान श्रीपरशुराम का जीवन अन्याय के विनाश और न्याय के संरक्षण का उद्घोष है। उन्होंने भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महारथियों को शस्त्रदीक्षा देकर धर्मयुद्ध की मर्यादा स्थापित की। वे केवल योद्धा नहीं, अपितु तपस्वी, ऋषि और मंत्रद्रष्टा हैं—ऋग्वेद के सूक्तों में जिनकी वाणी यज्ञ, समरसता और कल्याण की प्रार्थना करती है। उनका व्यक्तित्व त्याग, तपस्या, शौर्य और संतुलन का आदर्श है। संपूर्ण मानवता एवं समस्त जीव-जगत का कल्याण, वर्णाश्रम धर्म की रक्षा और सामाजिक समरसता की स्थापना ही भगवान श्रीपरशुराम का शाश्वत संदेश है।

भगवान श्रीपरशुराम केवल इतिहास या पुराणों के पात्र नहीं हैं, वे सनातन धर्म की जाग्रत चेतना हैं। जब-जब समाज में अधर्म, अन्याय और शक्ति का दुरुपयोग बढ़ा, तब-तब श्रीपरशुराम का तेजस्वी स्वरूप धर्म की पुनर्स्थापना हेतु प्रकट हुआ। उनका परशु दमन का नहीं, बल्कि संतुलन का प्रतीक है—अहंकार के उच्छेदन और न्याय की स्थापना का साधन। वे यह संदेश देते हैं कि शक्ति तप और धर्म से संयमित हो, और शौर्य करुणा से जुड़ा हो। श्रीपरशुराम का आदर्श आज भी समाज को यह स्मरण कराता है कि धर्म की रक्षा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि साहस, त्याग और संकल्प से होती है।

राष्ट्रीय परशुराम परिषद — सनातन चेतना का संगठित स्वर

राष्ट्रीय परशुराम परिषद की स्थापना जून 2016 में मेरठ (उत्तर प्रदेश) में  माननीय पंडित सुनील भराला जी (उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री एवं वरिष्ठ भाजपा नेता) द्वारा की गई। परिषद का उद्देश्य केवल संगठन निर्माण नहीं, बल्कि भगवान श्रीपरशुराम के दिव्य संदेश—धर्मरक्षा, न्यायबोध और अन्याय के निर्भीक प्रतिकार—को राष्ट्र और समाज के कण-कण तक पहुँचाना है। परिषद सनातन मूल्यों की रक्षा, ऐतिहासिक भ्रांतियों के निराकरण, तथा समाज में व्याप्त वैमनस्य, कटुता और जातीय विद्वेष के उन्मूलन हेतु सतत कार्य कर रही है। इसका लक्ष्य जागरूक, संगठित और धर्मनिष्ठ समाज की स्थापना है।

राष्ट्रीय परशुराम परिषद केवल एक संगठन नहीं, बल्कि सनातन धर्म की आत्मा से जुड़ा हुआ जनआंदोलन है। यह परिषद राष्ट्र के प्रत्येक सनातनी को भगवान श्रीपरशुराम के जीवन, दर्शन और संदेश से जोड़ने का कार्य कर रही है। परिषद का प्रयास है कि प्रत्येक परिवार, प्रत्येक युवा और प्रत्येक साधक के जीवन में धर्मबोध, न्यायभाव और राष्ट्रचेतना जागृत हो। शोध, आंदोलन, यज्ञ, यात्राएँ और ग्रंथ-प्रकाशन परिषद के वे माध्यम हैं जिनके द्वारा सनातन परंपरा को आधुनिक युग में पुनः प्रतिष्ठित किया जा रहा है। राष्ट्रीय परशुराम परिषद दृढ़ संकल्प के साथ यह उद्घोष करती है कि जब तक धर्म सुरक्षित है, तभी समाज, संस्कृति और राष्ट्र सुरक्षित रहेंगे।

स्थापना के उपरांत राष्ट्रीय परशुराम परिषद ने सनातन इतिहास में अनेक स्वर्णिम अध्याय जोड़े हैं।

भगवान श्री परशुराम का संदेश

परशुराम स्वाभिमान सेना

परशुराम स्वाभिमान सेना — धर्म, स्वाभिमान और न्याय के लिए समर्पित एक सशक्त संगठन।

परशुराम शक्ति वाहिनी

परशुराम शक्ति वाहिनी — साहस, संगठन और समाजसेवा का सशक्त प्रतीक।

श्री परशुराम राष्ट्रीय शोध पीठ

सनातन ज्ञान, इतिहास और संस्कृति के गहन अध्ययन एवं अनुसंधान के लिए समर्पित संस्थान।

राष्ट्रीय परशुराम परिषद - संस्थापक

माननीय पंडित सुनील भराला जी राष्ट्रीय परशुराम परिषद के संस्थापक एवं वैचारिक पथप्रदर्शक हैं। वे केवल एक संगठनकर्ता नहीं, बल्कि सनातन चेतना, राष्ट्रधर्म और सामाजिक न्याय के सजग साधक हैं। धर्म और संस्कृति के संरक्षण को जीवन का संकल्प बनाकर उन्होंने राष्ट्रीय परशुराम परिषद की स्थापना की, ताकि समाज को संगठित, जागरूक और आत्मसम्मान से युक्त किया जा सके। भगवान श्रीपरशुराम के आदर्श—धर्मरक्षा, न्याय और निर्भीकता—उनके चिंतन और कर्म के केंद्र में हैं, जिनसे प्रेरित होकर वे राष्ट्रहित में सतत सक्रिय हैं।

माननीय पंडित सुनील भराला जी का नेतृत्व विचार, चरित्र और कर्म—तीनों में दृढ़ता और स्पष्टता का प्रतीक है। वे मानते हैं कि जब तक समाज संगठित नहीं होगा, तब तक राष्ट्र सशक्त नहीं हो सकता। इसी दृष्टि से वे युवाओं में चेतना, विद्वानों में दिशा और समाज के प्रत्येक वर्ग में उत्तरदायित्व का भाव जागृत करने का कार्य कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय परशुराम परिषद एक वैचारिक आंदोलन के रूप में विकसित हुई है, जो केवल वर्तमान की चुनौतियों का समाधान नहीं, बल्कि भविष्य के राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला रख रही है।

संस्थापक के रूप में माननीय पंडित सुनील भराला जी ने राष्ट्रीय परशुराम परिषद को संघर्ष, साधना और संगठन—तीनों का संतुलित स्वरूप प्रदान किया है। उनका विश्वास है कि सनातन मूल्यों की रक्षा ही सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता की कुंजी है। इसी संकल्प के साथ वे परिषद को एक ऐसे मंच के रूप में स्थापित कर रहे हैं, जहाँ धर्मबोध, राष्ट्रचेतना और सामाजिक दायित्व एक साथ प्रवाहित हों। उनका नेतृत्व परिषद को केवल एक संस्था नहीं, बल्कि सनातन पुनर्जागरण का सशक्त माध्यम बनाता है।

माननीय पंडित सुनील भराला जी का जीवन सेवा, संकल्प और साधना का जीवंत उदाहरण है। वे मानते हैं कि सनातन धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र को दिशा देने वाली जीवन-पद्धति है। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय परशुराम परिषद विचार से आंदोलन और आंदोलन से राष्ट्रचेतना का स्वरूप ग्रहण कर रही है। वे प्रत्येक कार्यकर्ता को केवल अनुयायी नहीं, बल्कि धर्म, समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी योद्धा के रूप में गढ़ने का प्रयास करते हैं। उनका सतत प्रयास है कि राष्ट्रीय परशुराम परिषद आने वाली पीढ़ियों के लिए धर्मनिष्ठ, आत्मगौरव से युक्त और राष्ट्रसेवा के लिए प्रतिबद्ध समाज की आधारशिला बने।

भगवान श्री परशुराम चालीसा

राष्ट्रीय परशुराम परिषद की प्रथम और ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में भगवान श्री परशुराम चालीसा का लेखन एवं उसका राष्ट्रव्यापी प्रचार सनातन चेतना के पुनर्जागरण में एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ है।

यह पावन चालीसा आचार्य के. वी. कृष्णन, राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री परशुराम राष्ट्रीय शोध पीठ  द्वारा रचित की गई है। इस महान आध्यात्मिक कृति की रचना माननीय पंडित श्री सुनील भराला, संस्थापक – राष्ट्रीय परशुराम परिषद, के प्रेरणादायी मार्गदर्शन और नेतृत्व में संपन्न हुई।

भगवान परशुराम को सनातन धर्म में अधर्म के विनाशक, अन्याय के प्रतिकारक और मानवता के संरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है। चालीसा के माध्यम से भगवान परशुराम के तप, शौर्य, त्याग, शिक्षाओं तथा समाज के प्रति उनके अद्वितीय योगदान का भावपूर्ण वर्णन किया गया है। इसमें यह भी उल्लेखित है कि किस प्रकार उन्होंने पृथ्वी को 36 बार अत्याचारी एवं दुष्ट शक्तियों से मुक्त कर मानव समाज को राहत प्रदान की।

इस चालीसा का वितरण अब तक 2 करोड़ से अधिक सनातनी परिवारों तक किया जा चुका है।

भगवान श्री परशुराम जी - जीवन संस्करण

राष्ट्रीय परशुराम परिषद - प्रमुख पदाधिकारी

श्री सुनील दत्त शर्मा

राष्ट्रीय परशुराम परिषद - कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष

श्री अजय भारद्वाज

परशुराम स्वाभिमान सेना - राष्ट्रीय अध्यक्ष

डॉक्टर चिदात्मिका

परशुराम शक्ति वाहिनी - राष्ट्रीय अध्यक्ष

श्री विनय शर्मा

राष्ट्रीय परशुराम परिषद - राष्ट्रीय महामन्त्री (संगठन)

आचार्य के. वी. कृष्णन

श्री परशुराम राष्ट्रीय शोध पीठ - राष्ट्रीय अध्यक्ष

श्री अजय झा

राष्ट्रीय परशुराम परिषद - राष्ट्रीय महामन्त्री (न्यास)

राष्ट्रीय परशुराम परिषद - प्रमुख उपलब्धियाँ

भगवान परशुराम राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी एवं संत समागम - 19–20 जून 2022, हरिद्वार, उत्तराखंड

राष्ट्रीय परशुराम परिषद के तत्वावधान एवं माननीय पंडित सुनील भराला जी के मार्गदर्शन में हरिद्वार की पावन भूमि पर आयोजित भगवान श्री परशुराम विषयक राष्ट्रीय विद्वत सम्मेलन एवं संत समागम वैचारिक दृष्टि से एक ऐतिहासिक आयोजन रहा। इस संगोष्ठी का मूल उद्देश्य भगवान श्री परशुराम के जीवन, दर्शन और राष्ट्रधर्मी योगदान से जुड़ी उन भ्रांतियों एवं मिथकों का शास्त्रीय, ऐतिहासिक और तात्त्विक आधार पर निराकरण करना था, जो लंबे समय से समाज में प्रचलित रहे हैं। आयोजन ने भगवान श्री परशुराम को केवल एक पौराणिक चरित्र के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक चेतना और न्याय परंपरा के जीवंत प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।

दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर से पधारे संतों, विद्वानों, शिक्षाविदों, इतिहासकारों तथा सामाजिक-राजनीतिक चिंतकों ने सक्रिय सहभागिता की। भगवान श्री परशुराम के व्यक्तित्व, सामाजिक न्याय की अवधारणा, धर्मरक्षा, राष्ट्रबोध और सांस्कृतिक चेतना जैसे विषयों पर गहन शोधपत्र प्रस्तुत किए गए तथा सार्थक वैचारिक संवाद संपन्न हुआ। यह आयोजन केवल एक अकादमिक मंच तक सीमित न रहकर समाज को भगवान श्री परशुराम के वास्तविक स्वरूप और उनके विचारों की समकालीन प्रासंगिकता से जोड़ने का सशक्त माध्यम बना। संत समागम और बौद्धिक विमर्श के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि भगवान श्री परशुराम भारतीय संस्कृति के एक कालजयी आदर्श, वैचारिक शक्ति और प्रेरणास्रोत हैं।

शस्त्र नहीं, शास्त्र से समाज का पुनर्निर्माण

भगवान श्री परशुराम : अखंड शोध संगोष्ठी एवं संत संवाद

यह आयोजन इस मूल भावना को सुदृढ़ करता है कि समाज और राष्ट्र का पुनर्निर्माण केवल शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि शास्त्रसम्मत चिंतन, नैतिक मूल्यों और वैचारिक स्पष्टता से संभव है। भगवान श्री परशुराम के जीवन और दर्शन के माध्यम से प्रस्तुत यह संदेश आज के सामाजिक और राष्ट्रीय परिदृश्य में विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहाँ सांस्कृतिक चेतना और वैचारिक दृढ़ता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

अधिकार, आत्मसम्मान और संगठन — यही समाज की वास्तविक शक्ति है।

वृंदावन की पावन और आध्यात्मिक भूमि पर राष्ट्रीय परशुराम परिषद के तत्वावधान में आयोजित अखिल भारतीय ब्राह्मण अधिकार एवं राष्ट्रीय चिंतन संगोष्ठी वैचारिक दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला आयोजन सिद्ध हुई। इस दो दिवसीय संगोष्ठी का प्रमुख उद्देश्य ब्राह्मण समाज की वर्तमान सामाजिक स्थिति का सम्यक एवं यथार्थ मूल्यांकन करना, समाज से जुड़े अधिकारों और दायित्वों पर गंभीर विमर्श स्थापित करना तथा भविष्य के लिए एक सुदृढ़, संगठित और राष्ट्रहितकारी दिशा पर राष्ट्रीय स्तर पर संवाद को गति देना था। आयोजन ने आत्मचिंतन के साथ-साथ संगठनात्मक चेतना को भी सशक्त रूप में सामने रखा।

परशुराम के विचार — समाज के नव उत्थान का आधार

इस केंद्रीय विचार को आधार बनाकर आयोजित सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों से पधारे विद्वान, संत, सामाजिक चिंतक, संगठन पदाधिकारी तथा युवा प्रतिनिधियों ने सक्रिय सहभागिता की। भगवान श्री परशुराम के जीवन-दर्शन को समकालीन सामाजिक परिस्थितियों में प्रासंगिक बताते हुए उनके आदर्शों को समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पुनर्निर्माण से जोड़ने पर विशेष बल दिया गया। विचार-विमर्श में यह स्पष्ट किया गया कि परशुराम दर्शन केवल ऐतिहासिक संदर्भ नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन और न्याय की एक जीवंत परंपरा है।

दो दिवसीय चिंतन वर्ग के दौरान संगठन के विस्तार, समाज की सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूमिका, युवाओं की भागीदारी तथा वैचारिक सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन और सार्थक चर्चा हुई। वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि संगठित चेतना के अभाव में समाज अपनी भूमिका को प्रभावी रूप से निभा नहीं सकता, और इसलिए संगठन, विचार और संकल्प—तीनों का समन्वय आवश्यक है।

 

इस अवसर पर माननीय पंडित सुनील भराला जी ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि भगवान श्री परशुराम का दर्शन केवल अतीत की गाथा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक सशक्त मार्गदर्शक है। उन्होंने युवाओं से न्याय, शौर्य, तप और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों को आत्मसात करने का आह्वान करते हुए समाज और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया।

 

संगठन से संकल्प, संकल्प से समाज निर्माण इस मूल भावना के साथ संपन्न हुई यह राष्ट्रीय चिंतन संगोष्ठी ब्राह्मण समाज के आत्मचिंतन, संगठनात्मक सुदृढ़ता और सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा देने वाला एक प्रेरणादायी प्रयास सिद्ध हुई, जिसने विचार से कर्म और कर्म से राष्ट्रनिर्माण तक की यात्रा को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया।

भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का निर्णायक क्षण

“शोध, शास्त्र और संतों की सहमति से—

 20 नवंबर 2022 को काशी से एक ऐतिहासिक उद्घोष हुआ।”

भारतीय सनातन परंपरा के अमर प्रतीक, धर्म और न्याय के अधिष्ठाता भगवान श्री परशुराम की जन्मभूमि, तपस्थली और युद्धस्थली को लेकर राष्ट्रीय परशुराम परिषद द्वारा की गई ऐतिहासिक घोषणा ने राष्ट्रव्यापी सांस्कृतिक चेतना को एक नई दिशा प्रदान की। यह गौरवपूर्ण उद्घोष 20 नवंबर 2022 को बाबा विश्वनाथ की पावन नगरी काशी में संपन्न हुआ, जिसे भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के एक निर्णायक और दूरगामी प्रभाव वाले क्षण के रूप में देखा जा रहा है। यह केवल एक वैचारिक वक्तव्य नहीं, बल्कि सनातन परंपरा के ऐतिहासिक सत्य के पुनर्स्थापन का सशक्त प्रयास है।

राष्ट्रीय परशुराम परिषद द्वारा स्थापित भगवान परशुराम शोध पीठ ने विगत पाँच वर्षों तक भगवान श्री परशुराम के जीवन से जुड़े ग्रंथों, पुराणों, ऐतिहासिक संदर्भों, लोकपरंपराओं और भौगोलिक संकेतों पर गहन एवं सतत अनुसंधान किया। शास्त्रीय प्रमाणों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और देशभर के विद्वानों की सर्वसम्मति के आधार पर यह स्पष्ट उद्घोष किया गया कि भगवान श्री परशुराम की जन्मभूमि केवल और केवल मध्य प्रदेश में इंदौर के निकट स्थित जानापाव है। यह उद्घोष किसी मत या मान्यता पर आधारित नहीं, बल्कि शोध, तर्क और प्रमाण से पुष्ट निष्कर्ष का सार्वजनिक उद्घाटन है।

काशी की पावन भूमि पर हुआ यह उद्घोष राष्ट्रीय परशुराम परिषद के पाँच वर्षों के संकल्प व्रत की पूर्णता का प्रतीक भी बना। परिषद ने यह स्पष्ट किया कि भगवान श्री परशुराम के जीवन से जुड़ी जन्मस्थली, तपोस्थली और युद्धस्थली से संबंधित समस्त निष्कर्ष अब राष्ट्र के समक्ष प्रमाणिक, व्यवस्थित और शोधाधारित रूप में प्रस्तुत हैं। इस उद्घोष के माध्यम से इतिहास की विकृत व्याख्याओं को दूर कर सनातन परंपरा की प्रामाणिक धारा को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया गया।

 

इस ऐतिहासिक अवसर पर पूजनीय संतों, आचार्यों और देशभर से पधारे विद्वानों का दिव्य एवं गरिमामयी सानिध्य प्राप्त हुआ। वक्ताओं ने भगवान श्री परशुराम के शस्त्र और शास्त्र के अद्भुत संतुलन, उनकी न्यायप्रियता, धर्मरक्षा की चेतना और राष्ट्रबोध पर सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए। विद्वत समाज ने एक स्वर में यह स्वीकार किया कि भगवान परशुराम का व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति के नैतिक और वैचारिक आधार को समझने की कुंजी है।

 

इस उद्घोष के साथ यह महत्वपूर्ण घोषणा भी की गई कि भगवान श्री परशुराम की जन्मभूमि जानापाव में भव्य मंदिर का निर्माण किया जाएगा। यह स्थल भविष्य में केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, शोध, आध्यात्मिक चेतना और वैचारिक जागरण का प्रमुख केंद्र बनेगा। मंदिर निर्माण की यह योजना भगवान परशुराम के विचारों और जीवन-दर्शन को स्थायी स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

 

काशी से हुआ यह ऐतिहासिक उद्घोष केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक घोषणा भर नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक आत्मबोध की पुनर्प्रतिष्ठा है। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए भगवान श्री परशुराम के विचार, त्याग, तप और धर्मबोध को समझने का एक स्थायी संदर्भ बनेगा तथा भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्याय के रूप में स्मरण किया जाएगा।

आस्था का प्रवाह, संस्कृति का उत्थान

भगवान श्री परशुराम कुंड तीर्थ यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं रही, बल्कि यह सनातन संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और आध्यात्मिक जागरण की एक विराट एवं प्रेरणादायी यात्रा के रूप में सामने आई। इस यात्रा ने भारत की उस सांस्कृतिक आत्मा को अभिव्यक्त किया, जो भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर समाज को जोड़ने, एकता का भाव जाग्रत करने और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने का कार्य करती है। परशुराम कुंड जैसे पावन तीर्थ की ओर बढ़ता यह यात्रा-पथ श्रद्धा, तप और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बन गया।

दिनांक 14 जनवरी 2023 से 19 जनवरी 2023 तक अरुणाचल प्रदेश की पावन भूमि पर सम्पन्न हुई इस तीर्थ यात्रा ने अपने स्वरूप और व्यापक सहभागिता के कारण विशेष महत्व प्राप्त किया। देश के विभिन्न प्रांतों से आए श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इसे एक राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। कुल 106 सदस्यों का संगठित दल, यात्रा के संयोजक एवं राष्ट्रीय सह-संयोजक श्री मुकेश भार्गव जी के कुशल नेतृत्व में परशुराम कुंड की ओर प्रस्थान कर श्रद्धा, अनुशासन और संगठनात्मक एकता का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता रहा।

इस दिव्य यात्रा में परशुराम शक्ति वाहिनी की सक्रिय और समर्पित सहभागिता विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। प्रीति जी, अनीता जी, रुचि जी सहित अनेक पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने सेवा भाव, अनुशासन और सांस्कृतिक मर्यादाओं का अनुकरणीय परिचय दिया। पूरी यात्रा के दौरान संगठनात्मक समन्वय, आपसी सहयोग और सेवा की भावना ने यह स्पष्ट किया कि धार्मिक यात्राएँ सामाजिक एकता और संगठन की शक्ति को सुदृढ़ करने का प्रभावी माध्यम भी होती हैं।

भगवान श्री परशुराम कुंड तीर्थ यात्रा ने यह सिद्ध किया कि सनातन परंपराएँ आज भी समाज को एक सूत्र में पिरोने की अपार क्षमता रखती हैं। यह यात्रा श्रद्धा, सेवा, संगठन और संस्कृति के समन्वय का जीवंत प्रतीक बनकर उभरी, जिसने यह संदेश दिया कि आध्यात्मिक चेतना जब राष्ट्रीय भाव के साथ जुड़ती है, तो वह समाज और राष्ट्र दोनों को सशक्त दिशा प्रदान करती है।

धर्म की धार, राष्ट्र का आधार — परशुराम अवतार

सनातन संस्कृति की अक्षुण्ण परंपरा, संगठन की दृढ़ एकता और राष्ट्र के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भव्य साक्ष्य बना—101 कुंडीय भगवान श्री परशुराम महायज्ञ। भगवान श्री परशुराम जी की अवतरण स्थली जानापाव में आयोजित यह दिव्य आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सनातन चेतना के विराट स्वरूप, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय आत्मबोध का प्रभावशाली प्रकटीकरण सिद्ध हुआ। महायज्ञ का प्रत्येक क्षण धर्म, तप और सांस्कृतिक गौरव की अनुभूति कराता रहा।

राष्ट्रीय परशुराम परिषद द्वारा आयोजित श्री परशुराम जन्मोत्सव के इस पावन अवसर पर एक ऐतिहासिक क्षण तब साक्षात हुआ, जब परिषद के संस्थापक, वरिष्ठ भाजपा नेता एवं उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व राज्य मंत्री माननीय पंडित सुनील भराला जी ने मध्य प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री माननीय श्री शिवराज सिंह चौहान जी को भगवान श्री परशुराम का प्रतीक ‘फरसाभेंट कर सम्मानित किया। यह क्षण धर्म, परंपरा और राष्ट्र नेतृत्व के सम्मानजनक संगम का प्रतीक बनकर उभरा, जिसने सांस्कृतिक मूल्यों और राजनीतिक उत्तरदायित्व के समन्वय को रेखांकित किया।

 

महायज्ञ के अवसर पर जानापाव धाम के नव निर्माण की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल सामने आई। माननीय पंडित सुनील भराला जी ने मुख्यमंत्री माननीय श्री शिवराज सिंह चौहान जी के साथ भगवान श्री परशुराम की जन्मस्थली जानापाव में मंदिर के जीर्णोद्धार तथा विभिन्न विकास एवं निर्माण कार्यों की कार्ययोजना का अवलोकन किया। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए सनातन आस्था, सांस्कृतिक गौरव और ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित एवं सुदृढ़ करने की दिशा में एक दूरदर्शी कदम के रूप में देखी गई।

इस ऐतिहासिक आयोजन की गरिमा देश के प्रमुख जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति से और अधिक बढ़ी। कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय श्री शिवराज सिंह चौहान जी, केंद्रीय मंत्री माननीय श्री फग्गन सिंह कुलस्ते जी, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव माननीय श्री कैलाश विजयवर्गीय जी तथा रोहतक से सांसद माननीय श्री अरविंद शर्मा जी की सहभागिता ने आयोजन को राष्ट्रीय महत्व प्रदान किया। जनप्रतिनिधियों की यह उपस्थिति सनातन संस्कृति और राष्ट्रहित के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता का प्रतीक बनी।

 

जहाँ धर्म है, वहाँ परशुराम हैं;

जहाँ परशुराम हैं, वहाँ राष्ट्र सुरक्षित है।”

इस संकल्प और संदेश के साथ संपन्न हुआ 101 कुंडीय भगवान श्री परशुराम महायज्ञ यह स्पष्ट करता है कि सनातन संस्कृति केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य की सशक्त आधारशिला है। यह आयोजन भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का एक स्मरणीय अध्याय बनकर इतिहास में अंकित हुआ।।

महाकुंभ प्रयागराज 2025 में राष्ट्रीय परशुराम परिषद की प्रमुख उपलब्धियाँ


1. महाकुंभ 2025, प्रयागराज में लगभग 2 लाख वर्ग फुट क्षेत्र में भव्य भगवान श्री परशुराम शिविर की स्थापना की गई।, जो आयोजन के प्रमुख आकर्षणों में से एक रहा।

2. भगवान श्री परशुराम जी की 51 फीट ऊँची दिव्य प्रतिमा की स्थापना की गई, जिसने देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं का विशेष ध्यान आकर्षित किया।

3. श्री परशुराम आर्ट गैलरी का निर्माण किया गया, जिसमें भगवान परशुराम जी के जीवन के विभिन्न चरणों—बाल्यावस्था, गुरुकुल शिक्षा, तपस्या, युद्धभूमि एवं सामाजिक उत्थान—का सजीव एवं कलात्मक चित्रण किया गया।

4. सप्तऋषि कुटीर (सप्तऋषि कॉटेज) की स्थापना कर सप्तऋषियों की तपोभूमि और उनके योगदान को आध्यात्मिक रूप से प्रस्तुत किया गया।

5. विशाल कथा पंडाल में श्री परशुराम कथा का आयोजन किया गया, जिसमें देशभर के 21 प्रतिष्ठित कथावाचकों द्वारा दिव्य कथाओं का वाचन किया गया।


6. शिविर में प्रतिदिन लगभग 5000 श्रद्धालुओं के लिए भोजन (भंडारा) की व्यवस्था की गई तथा वे श्रीराम-परशुराम कथा एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागी बने।


7. संपूर्ण महाकुंभ अवधि में लगभग 51 लाख श्रद्धालुओं ने श्री परशुराम शिविर, कथा एवं आयोजनों में सहभागिता की।


8. श्रद्धालुओं के बीच 1 करोड़ 51 लाख श्री परशुराम जी की अवतारी रूप की प्रतिमाएँ एवं श्री परशुराम चालीसा का निःशुल्क वितरण किया गया।


9. शिविर में ४५ हवन-कुंड का सतत आयोजन किया गया, जिसमें 1 करोड़ 21 लाख 51 हजार आहुतियाँ समर्पित की गईं।


10. देशभर के चारों शंकराचार्यों द्वारा शिविर में पधारकर अपने पावन सान्निध्य एवं आशीर्वाद प्रदान किए गए तथा राष्ट्रीय परशुराम परिषद के प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई।


11. महाकुंभ 2025 के दौरान “श्री परशुराम आरती” गीत का भव्य रूप से लोकार्पण किया गया, जो श्रद्धालुओं में विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ।


12. यह संपूर्ण ऐतिहासिक एवं विराट आयोजन राष्ट्रीय परशुराम परिषद के संस्थापक एवं पूर्व मंत्री माननीय पंडित सुनील भराला जी के दूरदर्शी नेतृत्व, प्रेरणादायी मार्गदर्शन और संगठित कार्यशैली में अत्यंत सुचारु, अनुशासित एवं सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

राष्ट्रीय परशुराम परिषद की प्रथम और ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में भगवान श्री परशुराम चालीसा का लेखन एवं उसका राष्ट्रव्यापी प्रचार सनातन चेतना के पुनर्जागरण में एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ है।

यह पावन चालीसा आचार्य के. वी. कृष्णन, राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं विद्वान, श्री परशुराम राष्ट्रीय शोध पीठ द्वारा रचित की गई है। इस महान आध्यात्मिक कृति की रचना पंडित श्री सुनील भराला, संस्थापक – राष्ट्रीय परशुराम परिषद, के प्रेरणादायी मार्गदर्शन और नेतृत्व में संपन्न हुई।

भगवान परशुराम को सनातन धर्म में अधर्म के विनाशक, अन्याय के प्रतिकारक और मानवता के संरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है। चालीसा के माध्यम से भगवान परशुराम के तप, शौर्य, त्याग, शिक्षाओं तथा समाज के प्रति उनके अद्वितीय योगदान का भावपूर्ण वर्णन किया गया है। इसमें यह भी उल्लेखित है कि किस प्रकार उन्होंने पृथ्वी को 36 बार अत्याचारी एवं दुष्ट शक्तियों से मुक्त कर मानव समाज को राहत प्रदान की।

इस चालीसा का वितरण अब तक 2 करोड़ से अधिक सनातनी परिवारों तक किया जा चुका है। यह चालीसा:

  • हार्ड कॉपी के रूप में देशभर में वितरित की गई
  • सॉफ्ट कॉपी के रूप में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स एवं यूट्यूब पर उपलब्ध कराई गई

आज लाखों श्रद्धालु प्रतिदिन भगवान श्री परशुराम चालीसा का पाठ और श्रवण कर रहे हैं, जिससे समाज में धर्म, संस्कार और आध्यात्मिक चेतना का निरंतर विस्तार हो रहा है।

इस प्रयास के परिणामस्वरूप सनातनी समाज, विशेषकर युवा वर्ग, भगवान परशुराम के आदर्शों, उनके कर्तव्यबोध और मानवता के प्रति समर्पण से परिचित हुआ है। चालीसा ने यह संदेश सुदृढ़ किया है कि धर्म की रक्षा, अन्याय का विरोध और समाज कल्याण ही सनातन परंपरा का मूल है।

भगवान श्री परशुराम चालीसा का यह लेखन और प्रचार राष्ट्रीय परशुराम परिषद की वह ऐतिहासिक उपलब्धि है, जिसने सनातन मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाने का सशक्त कार्य किया है।

राष्ट्रीय परशुराम परिषद की एक ऐतिहासिक एवं दूरदर्शी उपलब्धि के रूप में भगवान श्री परशुराम जी के अवतारी युवा स्वरूप की प्रतिमा का निर्माण सनातन समाज के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पहल है।

पूर्व में भगवान परशुराम जी के केवल ऐसे चित्र उपलब्ध थे जिनमें उन्हें वृद्ध, दाढ़ीधारी अथवा युद्धभूमि में उग्र स्वरूप में दर्शाया गया था। भगवान परशुराम जी के युवा, तेजस्वी, संयमी एवं दिव्य अवतारी स्वरूप की कोई प्रतिमा प्रचलन में नहीं थी। इस अभाव को दूर करते हुए राष्ट्रीय परशुराम परिषद ने पहली बार भगवान परशुराम जी को युवा, सशक्त, आकर्षक एवं प्रेरणादायी रूप में प्रस्तुत किया।

यह प्रतिमा भगवान परशुराम जी को एक ऐसे अवतार के रूप में दर्शाती है जो:

  • शौर्य और ब्रह्मचर्य का संतुलन है

  • विद्या, संयम और धर्मरक्षा का प्रतीक है

  • युवा पीढ़ी के लिए आदर्श और प्रेरणास्रोत है

इस पावन प्रतिमा का अनावरण एवं विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा सनातन धर्म के महापर्व महाकुंभ (2025) में सम्पन्न हुई। इस अवसर पर प्रतिमा को परम पूज्य शंकराचार्य जी के आशीर्वाद से सनातन समाज को समर्पित किया गया।

महाकुंभ 2025 के पश्चात् राष्ट्रीय परशुराम परिषद द्वारा इस अवतारी प्रतिमा का व्यापक स्तर पर वितरण किया गया। अब तक यह प्रतिमा:

  • 2 करोड़ से अधिक सनातनी श्रद्धालुओं तक

  • देश के विभिन्न राज्यों, नगरों एवं ग्रामों में
    सफलतापूर्वक पहुँचाई जा चुकी है।

आज लाखों सनातनी हिंदू अपने घरों, मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों पर भगवान श्री परशुराम जी के इस युवा अवतारी स्वरूप की पूजा-अर्चना कर रहे हैं, जिससे समाज में धर्म, संस्कार और सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा मिली है।

भगवान श्री परशुराम जी की यह अवतारी प्रतिमा राष्ट्रीय परशुराम परिषद के उस संकल्प का प्रतीक है, जिसके माध्यम से सनातन मूल्यों को आधुनिक समाज और आने वाली पीढ़ियों तक प्रभावी रूप से पहुँचाया जा रहा है।

राष्ट्रीय परशुराम परिषद द्वारा सनातन धर्म के संरक्षण, प्रचार और सेवा के उद्देश्य से भगवान श्री परशुराम धाम के निर्माण का कार्य मेरठ में प्रारंभ किया गया है। यह धाम भगवान परशुराम जी के जीवन, आदर्शों, शिक्षाओं और मानव सेवा के सिद्धांतों पर आधारित एक व्यापक आध्यात्मिक एवं सामाजिक केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।

इस परियोजना के संचालन और क्रियान्वयन हेतु भगवान परशुराम सेवा ट्रस्ट की स्थापना की गई है। ट्रस्ट द्वारा भूमि विकास, संरचना निर्माण तथा आवश्यक व्यवस्थाओं का कार्य चरणबद्ध रूप से किया जा रहा है।

भगवान श्री परशुराम धाम को एक समग्र सनातन धाम परिसर के रूप में विकसित करने की योजना है, जिसमें निम्नलिखित प्रमुख संरचनाएँ एवं सुविधाएँ प्रस्तावित हैं।

  • भगवान श्री परशुराम का मुख्य मंदिर एवं आराधना स्थल
  • छात्रावास, जिसमें देशभर से आने वाले विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए आवास व्यवस्था होगी
  • परशुराम शोध एवं अध्ययन केंद्र, जहाँ भगवान परशुराम जी, सनातन परंपरा, वेद एवं शास्त्रों पर शोध कार्य किया जाएगा
  •  गोशाला, गौ-सेवा, गौ-संरक्षण एवं जैविक जीवनशैली के प्रचार हेतु
  •  भगवान श्री परशुराम जी के जीवन से जुड़े 56 पावन स्थलों एवं प्रतीकात्मक संरचनाओं का निर्माण
    सत्संग, प्रवचन एवं धार्मिक आयोजनों हेतु सभागार
  •  यज्ञ, हवन एवं वैदिक अनुष्ठानों के लिए यज्ञशाला
    ध्यान, साधना एवं योग केंद्र
    पुस्तकालय एवं ग्रंथागार
    अतिथि निवास, संतों, विद्वानों एवं आगंतुकों के लिए
  •  अन्नक्षेत्र एवं भोजनालय, सेवा भाव से संचालित
  •  चिकित्सा सहायता केंद्र एवं प्राथमिक उपचार सुविधा
  • पार्किंग, स्वच्छता, जल एवं विद्युत जैसी आधारभूत सुविधाएँ
  •  हरित क्षेत्र, उद्यान एवं शांत वातावरण हेतु वृक्षारोपण परिसर

भगवान श्री परशुराम धाम का उद्देश्य केवल एक धार्मिक स्थल का निर्माण नहीं है, बल्कि इसे सनातन संस्कृति, शिक्षा, शोध, सेवा और सामाजिक चेतना का एक स्थायी केंद्र बनाना है। यह धाम आने वाले समय में श्रद्धालुओं, विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का केंद्र बनेगा।

मेरठ में निर्माणाधीन भगवान श्री परशुराम धाम राष्ट्रीय परशुराम परिषद एवं भगवान परशुराम सेवा ट्रस्ट की एक दीर्घकालिक और दूरदर्शी पहल है, जो सनातन मूल्यों को समाज और भावी पीढ़ियों तक सुदृढ़ रूप से पहुँचाने का कार्य करेगी।

परशुराम चेतना -  त्रैमासिक ई-पत्रिका

संस्कृति • स्वाभिमान • संगठन • राष्ट्र सर्वोपरि

राष्ट्रीय परशुराम परिषद की यह त्रैमासिक पत्रिका केवल एक प्रकाशन नहीं, बल्कि विचार, शोध और राष्ट्रचेतना का सशक्त दस्तावेज है। इसमें परिषद की स्थापना से लेकर वर्तमान तक की यात्रा, प्रमुख उपलब्धियाँ, ऐतिहासिक घोषणाएँ, राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन, सामाजिक जागरण अभियान, सेवा कार्य, वैचारिक मंथन और भविष्य की योजनाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है।

इस अंक में भगवान परशुराम के जीवन-दर्शन, शोध आधारित निष्कर्षों, परिषद की प्रमुख इकाइयों — शोध पीठ, स्वाभिमान सेना, शक्ति वाहिनी, धर्म प्रकोष्ठ एवं विधि प्रकोष्ठ — की गतिविधियों तथा देशभर में आयोजित महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की झलक सम्मिलित है।

यह पत्रिका संगठन के संकल्प, संघर्ष और सतत राष्ट्रनिर्माण के प्रयासों का प्रतिबिंब है।

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